Bilaspur: मूक-बधिर पीड़िता की गवाही पर हाईकोर्ट सख्त, आरोपी की उम्रकैद बरकरार
प्लास्टिक गुड़िया और इशारों से दी गई गवाही बनी अहम सबूत
बिलासपुर के एक संवेदनशील मामले में मूक-बधिर पीड़िता ने अदालत में इशारों और प्लास्टिक की गुड़िया के माध्यम से अपनी आपबीती बताई।
पीड़िता बोल और सुन नहीं सकती थी, इसके बावजूद अदालत ने उसकी गवाही को गंभीरता से लेते हुए उसे महत्वपूर्ण साक्ष्य माना।
ट्रायल कोर्ट ने सुनाई आजीवन कारावास की सजा
दुभाषिए और मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर फैसला
सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट ने दुभाषिए की मदद ली और पीड़िता की बातों को समझा।
- प्लास्टिक की गुड़िया के जरिए घटना का विवरण
- दुभाषिए की पुष्टि
- मेडिकल रिपोर्ट
इन सभी आधारों पर कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 450 और 376 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई।

हाई कोर्ट में चुनौती, सजा बरकरार
गवाही की वैधता पर उठे सवाल, कोर्ट ने खारिज की अपील
आरोपी ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी और पीड़िता की गवाही पर सवाल उठाए।
इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच में हुई।
कोर्ट ने अपील खारिज करते हुए साफ कहा कि मूक-बधिर गवाह की गवाही भी पूरी तरह वैध है।
इशारों से गवाही भी मानी जाएगी ठोस साक्ष्य
हाई कोर्ट का अहम निर्देश
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि:
- जो गवाह बोल और सुन नहीं सकता
- वह इशारों, हाव-भाव या प्रदर्शन के जरिए गवाही दे सकता है
ऐसी गवाही को ठोस मौखिक साक्ष्य माना जाएगा, यदि वह विश्वसनीय हो और सही तरीके से समझी गई हो।
क्या है पूरा मामला
यह मामला एक जन्म से मूक-बधिर युवती से जुड़ा है, जिसके साथ उसके ही रिश्तेदार ने उस समय गलत काम किया जब वह घर में अकेली थी।
घटना के बाद पीड़िता ने परिजनों को इशारों में पूरी जानकारी दी और आरोपी की पहचान की।
इसके बाद मां की शिकायत पर पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपी को गिरफ्तार किया।
कोर्ट ने अपनाए विशेष उपाय
सुनवाई को आसान बनाने के लिए किया गया प्रयोग
जब पीड़िता कुछ सवाल समझ नहीं पा रही थी, तब ट्रायल कोर्ट ने प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए:
- प्लास्टिक की गुड़िया का उपयोग किया
- प्रशिक्षित दुभाषिए की मदद ली
इन उपायों से कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया कि पीड़िता अपनी बात स्पष्ट रूप से रख सके।
निष्कर्ष
बिलासपुर का यह फैसला न्याय व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, जहां अदालत ने विशेष परिस्थितियों में भी सच्चाई को प्राथमिकता दी।
यह निर्णय बताता है कि न्याय पाने के लिए आवाज होना जरूरी नहीं, बल्कि सच्चाई और साक्ष्य सबसे अहम होते हैं।







