सुकमा एर्राबोर हमला: 2 घंटे तक चला माओवादी हमला, 35 ग्रामीणों की हत्या, 220 घर जले
17 जुलाई 2006 की वह काली रात
सुकमा एर्राबोर हमला : सुकमा जिले के एर्राबोर में 17 जुलाई 2006 की रात बस्तर के इतिहास की सबसे भयावह घटनाओं में से एक बन गई। सैकड़ों माओवादियों ने गांव और सलवा जुडूम राहत शिविर को चारों ओर से घेर लिया।
अंधाधुंध फायरिंग और आगजनी का तांडव
करीब 500 से 1000 माओवादियों ने पहले गोलीबारी की, फिर घरों में आग लगाना शुरू कर दिया। यह हिंसा करीब 1 से 2 घंटे तक जारी रही।
35 निर्दोषों की गई जान
इस हमले में 33 से 35 ग्रामीणों की मौत हो गई, जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे। वहीं 200 से अधिक घर जलकर राख हो गए और सैकड़ों लोग बेघर हो गए।

“जिंदा बचने की उम्मीद खत्म हो गई थी”
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, माओवादी बंदूक, चाकू, तीर-धनुष और अन्य धारदार हथियारों से लैस थे। वे घर-घर जाकर हमला कर रहे थे और सामने आने वाले लोगों को बेरहमी से मार रहे थे।
सुरक्षा कैंप भी रहा घेराबंदी में
हमले के दौरान गांव के पास स्थित सुरक्षा कैंप को भी माओवादियों ने घेर लिया था।
एंटी लैंडमाइन और घात से फंसे जवान
घात लगाकर बैठे नक्सलियों और एंटी-लैंडमाइन के खतरे के कारण जवान बाहर नहीं निकल सके, जिससे गांव में मदद पहुंचने में देरी हुई।
सलवा जुडूम के विरोध में किया गया हमला
बताया जाता है कि यह हमला सलवा जुडूम अभियान के विरोध में किया गया था। माओवादी इसे अपने खिलाफ मानते थे, इसलिए राहत शिविर को निशाना बनाया गया।
देशभर में मचा था हड़कंप
एर्राबोर कांड ने न केवल बस्तर बल्कि पूरे देश को झकझोर दिया था। इस घटना के बाद सुरक्षा व्यवस्था और नक्सल विरोधी रणनीतियों पर सवाल उठे
आज बदली तस्वीर, लेकिन जख्म अभी भी ताजा
आज एर्राबोर में विकास के कई काम हुए हैं—सड़क, शिक्षा और सुरक्षा बेहतर हुई है। लेकिन उस रात का दर्द आज भी ग्रामीणों के दिलों में जिंदा है।







